बुधवार, 4 सितंबर 2024

सतपुतिया !





सत +पुतिया जैसा की नाम से ही पता चलता है कि सत अर्थात सात पुतिया शब्द पुत मतलब पुत्र से लिया गया है।
पुराने किस्से कहानी में अक्सर राजा, बनिया इत्यादि के सात पुत्र का वर्णन मिलता है।
जैसा की इसका नाम सात पुत्र से संबंधित है उसी प्रकार इसको खाने के पीछे भी वजह है।
उत्तर प्रदेश, बिहार या अन्य राज्यों में पुत्र के लम्बी आयु, उत्तम स्वास्थ्य के लिए माताएँ " ज्यूतिया "नाम का व्रत करती है। उस व्रत में सतपुतिया की सब्जी खाना अनिवार्य माना जाता है।
जहाँ पर आसानी से उपलब्ध हो जाती है वहाँ पर तो नहीं लेकिन पंजाब जैसे राज्यों में जहाँ पर इसकी खेती नहीं होती लेकिन उत्तर प्रदेश, बिहार के रहने वाले अधिक है और व्रत के दिन इस सब्जी की मांग होती है। व्रत वाले दिन वहाँ पर तो ये सोने के भाव बिकती है। उसी दिन ही सिर्फ सब्जी मंडी में दिखाई भी देती है।
गांव में तो गन्ने, मक्के के खेत में बो दी जाती है, कहीं खेतों की मेढ़ पर बो देते है और डंडे गाड़ कर रस्सी बांधकर चढ़ा देते है। ये ऐसी सब्जी है जिसका अपना कोई खेत नहीं होता है ये सहफ़सल के रूप में अन्य सब्जी या फ़सल के साथ खेत के किनारे या छप्पर, टाटी पर लटक कर अपना जीवन व्यतीत कर लेती है।
खेतों की मेढ़ पर बाढ़ जिसे हमारे अवध क्षेत्र में पाढ कहते है उस पर खूब फ़ैल जाती है। शाम के समय इस पर छोटे छोटे पीले फूलों की बाहार आ जाती है जिस पर तितलियाँ, भौरे गुन गुन गाते हुए आनंद लेते है।
ये सात फल के गुच्छे में होती है इसलिए इसका नाम सतपुतिया पड़ा है।
ये चार अंगुल से अधिक बड़ी नहीं होती है। बस जैसे ही तनिक हष्ट पुष्ट दिखे तोड़ लीजिये।
सुबह सुबह इसे नहला धुला कर, काट लीजिये। लोहे की कड़ाही में सरसों के तेल में,लहसुन,मिर्च का डाढ़ा (तड़का )देकर इसे धीमी आंच पर बनाइये। ये सब्जी पानी अधिक छोड़ती है इसलिए जब इसका पानी लगभग सूख जाये तब तीखा, चटपटा मिर्ची वाला नमक डालें। जब कड़ाही में हल्की हल्की चिपकने लगे तब समझिये पक गयी है।
फिर क्या गर्म गर्म रोटी या पराठे के साथ सुबह के नाश्ते का आनंद लें और स्वस्थ रहे, हमेशा निरोगित रहे।

 
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गुरुवार, 22 अगस्त 2024

हमारे बुजर्ग हम से वैज्ञानिक रूप से बहुत आगे थे।

 हमारे बुजर्ग हम से वैज्ञानिक रूप से बहुत आगे थे। थक हार कर वापिस उनकी ही राह पर आना पड़ रहा है। 😊

1. मिट्टी के बर्तनों से स्टील और प्लास्टिक के बर्तनों तक और फिर कैंसर के खौफ से दोबारा मिट्टी के बर्तनों तक आ जाना।

2. अंगूठाछाप से दस्तखतों (Signatures) पर और फिर अंगूठाछाप (Thumb Scanning) पर आ जाना।
3. फटे हुए सादा कपड़ों से साफ सुथरे और प्रेस किए कपड़ों पर और फिर फैशन के नाम पर अपनी पैंटें फाड़ लेना।

4. सूती से टैरीलीन, टैरीकॉट और फिर वापस सूती पर आ जाना।
5. जयादा मशक़्क़त वाली ज़िंदगी से घबरा कर पढ़ना लिखना और फिर IIM MBA करके आर्गेनिक खेती पर पसीने बहाना।

6. क़ुदरती से प्रोसेसफ़ूड (Canned Food & packed juices) पर और फिर बीमारियों से बचने के लिए दोबारा क़ुदरती खानों पर आ जाना।

7. पुरानी और सादा चीज़ें इस्तेमाल ना करके ब्रांडेड (Branded) पर और फिर आखिरकार जी भर जाने पर पुरानी (Antiques) पर उतरना।

8. बच्चों को इंफेक्शन से डराकर मिट्टी में खेलने से रोकना और फिर घर में बंद करके फिसड्डी बनाना और होश आने पर दोबारा Immunity बढ़ाने के नाम पर मिट्टी से खिलाना....

9. गाँव, जंगल, से डिस्को पब और चकाचौंध की और भागती हुई दुनियाँ की और से फिर मन की शाँति एवं स्वास्थ के लिये शहर से जँगल गाँव की ओर आना।

इससे ये निष्कर्ष निकलता है कि टेक्नॉलॉजी ने जो दिया उससे बेहतर तो प्रकृति ने पहले से दे रखा था।
आभार स्वदेशी ❤️🙏




शनिवार, 6 जुलाई 2024

पुरुष को समझना इतना भी सरल नहीं

  पुरुष को समझना

इतना भी सरल नहीं
जितना समझ लिया जाता है...
अनेकों
संवेंग, कल्पनाएं,
भावनाएं और अभिव्यक्तियां...
जो छिपी हैं
भीतर
गहराइयों में
हृदय के
किसी अंतिम कोने में...
जहां तक
पहुंच पाना
किसी भी साधारण
गोताखोर के लिए
पार पाना
सरल नहीं...
दूर से देखने पर लगता है
मानो पार पा लिया
किन्तु निकट जाने पर लगता है
जहां से प्रारम्भ किया था
वहीं हैं..!
उन्हें समझने के लिए
अपनाना होता है
उनके भावों को...
छूना होता है
उनकी आत्मा को...
पकड़ना होता है
उनके चंचल मन को...
समेटना होता है
उनके उन तमाम दुखों को,
जिनमें रहकर
उन्होंने पूरी उम्र गुजार दी
सुनना होता है उन्हें,
अपने तमाम
भावों को त्याग कर
बस मातृत्व भाव में...
और पोंछना होता है
उनके बहते आंसुओं को...
क्योंकि पुरुष का
किसी के सामने
अपने दुखों और
परेशानियों को
साझा करना
जितना कठिन है
उससे अधिक कठिन है
पुरुष के
आंसुओं को समेटना...
तब पुरुष ठहरता है
और जब पुरुष ठहरता है
तब वह तटस्थ हो जाता है
अपनी स्त्री के लिए...!!



धीरे से

 


धीरे से

कुछ कहकर
बदली में छुप जाता है वो चांद..!
निखरा निखरा है
बरसात के बाद आसमान का चेहरा..!
चांदनी में धुली धुली पत्तों की
भींगी शाखें
झुकी जाती है जमीन पर...!
कई नामों से
जैसे कोई बुला रहा हो मुझको...!
हवा यह पाक सी महकी हुई
पेड़ों पर बहती है जब जब
मोती से गिरते है
पत्तों के किनारों से...!
रात कोई
जादू लिए दामन में
चुपके से चली आई है मेरी खिड़की के
बाहर...!
कहती है...
काश !
इस लम्हे में कही आप भी
शामिल होते..!!

जैसे कुछ लिख देने से

 


जैसे कुछ लिख देने से

बन ही जाती है
कविता, नज़्म, रुबाई...!
मन में अनुराग भरा हो तो
एक दिन हो ही जाता है प्रेम...!
जंगल में पेड़ों के नीचे
चुपचाप खड़े हो
तो सुनाई देने लगती है
ओस की आवाज़ें...!
डूबने से डरने वालों को
डुबा ही लेती है किताबें..!
ज्ञान की थाह बना ही देती है
'ज्ञानेन्द्रपति'...!
उड़ने की चाह एक दिन
पंख उगा ही देती है...!
मन के द्वंद्वों का ज़वाब ढूंढते
कई लोग बन जाते हैं 'बुद्ध...!'
विचारों की भट्टी तपाते हुए
एक दिन 'अज्ञेय' बना ही देती है...!
आकाश गंगाओं की दूरी पाट कर भी
रुह अपना ठिकाना ढूंढ लेती है..!
जानती हूं ...
एक दिन तुम भी मुझे
मिल ही जाओगे !!

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2024

मैने किताबें मांगी

 मैने किताबें मांगी

मुझे चूल्हा मिला...
मैने दोस्त मांगा
मुझे दूल्हा मिला...
मैने सपने मांगे
मुझे प्रतिबंध मिले...
मैने संबंधी मांगे
मुझे अनुबंध मिले..
कल मैने धरती मांगी थी
मुझे समाधि मिली थी
आज मैं आकाश मांगती हूं
मुझे पंख दोगे..?


न जाने कौन सी कहानी
उदास है ज्यादा...
वो औरत
जो थी इतनी मजबूर
कि बेचना पड़ा उसे अपना वक्त
अपनी मुस्कुराहट
अपना जिस्म...!
या
वो मर्द
जो पड़ गया था इतना अकेला कि
खरीदना पड़ा उसे
दूसरे का वक्त
दूसरे की मुस्कुराहट
दूसरे का जिस्म..!!

अब कौन?

 अब कौन?.

रोज़ रोज़ खुदा ढूंढे,
जिसको न मिला वही ढूंढे,
रात आयी है तो सुबह भी होगी,
आधी रात में कौन? सुबह,
ढूंढे.
ज़िंदगी है तो जी!.?. खोल कर
जियो, रोज़ कौन क्यूं जीने,
की वजह
ढूंढे.
चलते, फिरते, पत्थरों- के शहर
में, पत्थर खुद..
पत्थरों, में,
खुदा,,
ढूंढे.
धरती को जन्नत बनाना है अगर
हर शख्स इंसानं में इंसान,
ढूंढे.
💫


मेरे परिवार में हम चार भाई-बहन थे

 मेरे परिवार में हम चार भाई-बहन थे — मैं, और मेरी तीन बहनें। दो बहनें बड़े शहरों में अच्छे घरों में ब्याही गई थीं, और एक थी राधा… जो किस्मत ...